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कविता


मांगता है संस्कृति की भीख, दीन होकर सारा संसार।
याचना करता है बस एक, बना दे मानव ह्रदय उदार।।

जल रहा है हर टुकड़ा आज, बुझाने को दुर्लभ है नीर।
सभी हैं भौतिकता में लिप्त, कौन सुनता है किसकी पीर।।

तड़पती मानवता को देख, दया का कौन उठाए भाव।
कहां हैं कितने सच्चे सन्त, दिखा दें जो सबको सद्भाव।।

मनुज ने छोड़ा मानव धर्म, त्याग कर अमृत का पय विन्दु।
अशिक्षा की शिक्षा का कर्म, दे रहा तुच्छ वासना सिन्धु।।

छोड़ कर सन्त कुटी को लोग, चले हैं भौतिकता की ओर।
बन रही है वह निशि दिन मौत, पा रहे हैं सब दण्ड कठोर।।

बढ़ रही मन की तृष्णा आज, हृदय को समझ रहे हम यन्त्र।
तभी तो भटका विश्व समाज, भूल कर शिव का सक्षम मन्त्र।।

रास्ता दिखलायेगा कौन, छोड़ आए हम गुरु का प्यार।
दिशाएं हैं अब तो सब मौन, हो सकेगा कैसे उद्धार।।

चले हैं मन की आंखें मूद, शून्य में ज्ञान खोजने लोग।
पहनकर सन्यासी का वस्त्र, भोगने को उद्यत हैं भोग।।

नहीं है योग नहीं है भोग, नहीं है सत का सहज विचार।
छोड़ सत्कर्म पालते रोग, चाहते हैं अनुचित अधिकार।।

स्वार्थ का घातक हुआ प्रकोप, हो गया दूषित मानव धर्म।
हुआ जब मानवता का लोप, कौन कर पाएगा सत्कर्म।।

आज कमजोरी है बस एक, बिक रहा है सबका व्यवहार।
लुटा ईमान धर्म को लोग, पहनते हैं हीरों का हार।।

मनों को अधिकृत करके लोभ, दिखाया माया रंग शरीर।
उसी ने किया हमें बर्बाद, छीन कर अनुपम अमृत क्षीर।।

हुआ मन इसी तरह परतन्त्र, हो रहा है शोषित हर ओर।
तोड़ पाएगा बेडी कौन, लायेगा आजादी का भोर।।

मिटाने में मिटने में विश्व, खोजता है जीवन का चैन।
यही सारे कष्टों का बीज, इसी से दुनिया है बेचैन।।

सोच लो कैसी है यह भूल, भुला दी मन की सहज बहार।
छोड़ आधार भूत सत्कर्म, बनाने चले सुखद संसार।।

तोड़ कर सत्य ज्ञान की नींव, कह रहे हो खुद को भगवान।
जोड़ कर दीन ह्रदय का रक्त, नहीं बन पाओगे धनवान।।

लोभ में पड़ करके हर बार, खो रहे हो जीवन की शक्ति।
भावना में छल कपट अनेक, करोगे कैसे तुम सद्भक्ति।।

नहीं सत्संग दया का भाव, दान करते हो कितनी बार।
टिकेगा कैसे झूठ प्रभाव, नहीं है जब दिल में उपकार।।

-श्रीकान्त सिंह, नोएडा

2010-03-05 05:35:48  print
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