अपने जीवन के चालीस साल बाद मुझे समझ आया है कि भारतीय नौकरी पेशा मध्य-वर्ग अत्यंत चरित्रहीन है। वह झूठ और दिखावे पर जीता है। वह अपनी प्राचीन संस्कृति के झूठे ढिंढोरे पीटता है पर पढ़ लिख कर भी समाज के लिए कुछ नहीं करता है, बल्कि केवल अपने में डूबा रहता है। उसके लिए झूठ बोलना या झूठा जीवन बिताना पाप नहीं, बल्कि प्रेम और सेक्स के बारे में बात करना पाप है। खास कर arranged marriage हमारे समाज के लिए एक श्राप है, एक सामाजिक ठप्पा है। इस रीत के लिए मेरे मन में अब कोई जगह नहीं। खासकर मध्यवर्गीय मां बाप को यह दिखाना होता है कि वे अपने कर्तव्यों के निवृत्त हो गए हैं। लड़की के मामले में मां बाप को यह सहन नहीं होता कि वह बिना ठप्पे के किसी के साथ रहे। अगर दो लोग एक दूसरे को पसंद करते हैं और एक दूसरे पर विश्वास करते हैं तो साथ रहने के लिए शादी के नाम का ठप्पा क्यों चाहिए? राजा महाराजाओं, या धनी लोगों के मामलों में सत्ता या बहुत सारे धन के बदले शादियां फिर भी समझ में आती हैं। आम लोगों में तो यह सामान्यत एक नौकरी की तरह टैक्स बचाने या अन्य छोटे मोटे कारणों के लिए केवल एक अनुबंध (contract) होता है, और होना चाहिए, जो किसी भी समय तोड़ा जा सके। लेकिन हमारे समाज ने इसे विकृत कर दिया है। बच्चे भले रो रोकर किसी रिश्ते में ज़िंदगी गुज़ार दें, पर मां बाप की समाज में नाक ऊंची रहनी चाहिए। इसी को शादी की सफलता माना जाता है। हमारे मध्य-वर्ग में लड़के लड़की का आपसी प्रेम कोई मायने नहीं रखता। लड़के लड़कियों में खुद काबिल बनकर जीवन-साथी ढूंढने के लिए प्रेरित करने की बजाए बिना जान पहचान उन्हें अजनबियों के साथ जीवन-भर के बंधन में बांध देने की रीत है हमारे समाज में। लोगों को दूसरों की शादी के लिए लड़के लड़कियां ढूंढने का शौक होता है। किसी के भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने का उत्साह होता है। पर कुछ गलत हो जाए तो सब अपनी गलती मानने की बजाए छुपने लगते हैं। प्रेम को शादी के बाद ही मान्यता मिलती है। जो लोग एक दूसरे को जानते नहीं, उन्हें पहले आजीवन बंधन में बांध कर, फिर उनसे आपसी प्रेम की अपेक्षा की जाती है। शादी से पहले लड़का लड़की मिलें, यह हमारे समाज से सहन नहीं होता। इस समाज में सच्चे रिश्तों पर ज़ोर नहीं दिया जाता। लड़के लड़की के माता पिता का अक्सर आपस में कोई संबंध या बातचीत नहीं होती, पर वे लड़के और लड़की से हमेशा साथ रहने की अपेक्षा करते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ जिसने मुझे व्यक्तिगत, मानसिक, आर्थिक और व्यावसायिक रूप से लगभग तबाह कर दिया। मेरी इस आत्मकथा के पात्र हैं- मेरे पापा - मम्मी, मेरा एकमात्र बड़ा भाई, मुझसे बड़ी बहन स्वप्न जिसकी 2007 में मृत्यु हो गई, बड़ी बहन कंचन, जो भाई से छोटी है, उनकी बेटी नन्नू, मेरे चाचा जी, चाची जी, चचेरा भाई मनु, चचेरी बहन पूजा और मेरी पत्नी मोनिका। चाचा जी के परिवार की हमारे परिवार में अत्यंत अहमियत और भूमिका रही है, हम बच्चों से भी ज़्यादा। इस कहानी का मुख्य turning point है जनवरी 2001 में मेरा जर्मनी आना। यह कहानी मुख्य रूप से उससे पहले और उसके बाद के जीवन में बंटी है। संक्षेप में कहानी यूं हैः 1997 में भारत में मेरा इंजीनियर के तौर पर करियर बहुत अच्छा न होने पर मेरे रूढिवादी माता पिता ने मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़ मेरी शादी कर दी। यह बहुत जल्द साफ हो गया कि यह शादी एक भूल थी। करीब साढे तीन साल बाद जैसे समाज में बिना चेहरा खोए, इस समस्या का indirect समाधान निकल आया। मोनिका नौकरी के लिए अमरीका चली गई। तब तक किसी को कोई समस्या नहीं थी। पर कुछ महीनों बाद 2001 में जब मैं जर्मनी आ गया तो सबको फिर से मिर्ची लगने लगी। सब को लगने लगा कि मैं यहां नई दुनिया बसा लूंगा और उनका झूठ दुनिया के सामने आ जाएगा। घरवाले फोन कर कर के मोनिका को जर्मनी बुलाने के लिए दबाव डालने लगे। मोनिका पहले कुछ दिन के लिए मुझे जर्मनी मिलने आई। पर वापस जाते ही उसकी नौकरी छिन गई। दूसरी नौकरी ढूंढने की बजाए रो रो कर मुझे उसे जर्मनी बुलाने के लिए फोन करने लगी, यह बहाना बना कर कि उसे कुछ ही दिन में अमरीका छोड़ना पड़ेगा। मेरे कई दोस्तों ने ऐसा न करने की सलाह दी। पर फिर भी मैंने उसपर तरस खाया और जर्मनी बुला लिया। यह मेरी बहुत गंभीर गलती थी। मुझे उसे वापस भारत जाने देना चाहिए था। फिर उसका और सबका झूठ दुनिया के सामने आ जाता। मुझे, जिसने यहां आकर नई दुनिया लगभग बसा ली थी, को दोबारा बर्बाद नहीं होना पड़ता। और इस बर्बादी की कहानी अंतहीन है। मेरी बर्बादी पर माता पिता, भाई बहन, ससुराल, सब ने भारत में अपने महल खड़े कर लिए हैं, और मेरा अंतहीन पैसा, करियर और व्यक्तिगत जीवन बे-वजह बर्बाद हो गया है। अब तो बच्चों के जीवन का प्रश्न भी बहुत गंभीर रूप से सामने है। मैं मानता हूं कि शादी के समय मैं एक सफल व्यक्ति नहीं था। पर career और धन तो देर सवेर बन जाते हैं। पर एक बार शादी के चक्रव्यूह में फंसकर दोबारा नहीं निकला जा सकता। कम से कम, मेरे और मेरे सुसराल जैसे बहुत ही रूढ़िवादी विचारों वाले परिवारों में रह कर तो बिल्कुल नहीं। पर मैंने जो इन सालों में सीखा, मेरे साथ जो हुआ, शायद किसी और का मार्गदर्शन कर सके, इस उम्मीद के साथ यह कहानी लिख रहा हूं। अगस्त 2010 में जब मैं अकेला भारत गया तो मैंने देखा कि मेरा बलिदान बिल्कुल बेकार चला गया है। परिवार में मेरी कोई कीमत ही नहीं है। सब यह स्वीकार करने की बजाए कि मैंने किस तरह 2003 में उनका कहना मानकर, अपनी ज़िंदगी को बर्बाद करके उन्हें पुलिस के चक्कर से बचाया था, सब उसके ऊपर झूठी कहानियां रच रहे हैं। उन्हें पता है कि उसके बाद तो मेरे दो बच्चे हो गए हैं, अब मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता। इसका पक्का यकीन मुझे तब हुआ जब कंचन दीदी की बेटी नन्नू नवंबर 2010 में कंपनी की ओर से पहली बार अमरीका गई। वहां वह पूजा से मिली। थोड़े दिनों बाद भारत में उसकी मंगनी हुई। इसमें भी पूजा शामिल हुई। इसमें आपत्ति लायक बात यह है कि मुझे इन बातों का बाद में पता चला। तब मुझे यकीन हो गया कि झूठ तक तो सब सहनीय था, पर अब मेरी परिवार में बिल्कुल कीमत नहीं है। चाचाजी का परिवार ही हमारे परिवार का भगवान है। आखिर 21 दिसंबर 2010 को मैंने इंटरनेट पर सार्वजनिक घोषणा करके अपने परिवार से, यानि अपने माता पिता, भाई बहन और उनके परिवारों से रिश्ता तोड़ लिया। 13 अप्रैल 1997 से लेकर लगभग चौदह वर्ष की मानसिक यातना सहने के बाद मुझ में ऐसा निर्णय लेने का साहस आया। मुझे अपने बच्चों की ज़िंदगी बरबाद होती दिख रही है जो बहुत दुखद है, ऊपर से मैं भी कभी इस मुसीबत से बिल्कुल आज़ाद तो शायद कभी नहीं हो पाऊंगा, मुसीबतें मेरे पीछे पड़ी रहेंगी। कम से कम ताकि मैं अपने बच्चों को सच्चाई पर रहना सिखा सकूं, इसलिए मुझे लगता है कि अपने झूठे परिवार से दूरी रखना महत्वपूर्ण है। इसलिए मैं नहीं चाहूंगा कि मेरे परिवार वालों में से कोई भी मुझसे और मेरे बीवी बच्चों से किसी प्रकार का संपर्क या लेन देन न रखे। लेकिन मेरे इस निर्णय का किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जैसे यह तो होना ही था। मैं तो बर्बाद हो चुका था। किसी पर मेरे इस निर्णय का सीधा प्रभाव नहीं पड़ना था। हमारा परिवार एक निम्न मध्यवर्गीय, नौकरी पेशा परिवार है। हमारे परिवार में पिता जी और मेरे बड़े भाई मुख्य तौर पर परिवार के मुख्य वाहक और मार्ग दर्शक रहे हैं। मेरे माता पिता ने आजीवन पंजाब के बरनाला नामक शहर के सरकारी बिजली बोर्ड में बतौर क्लर्क काम करके हम चार बच्चों को पाला-पोसा, पढ़ाया लिखाया। roughly कहा जा सकता है कि दोनों बड़े बच्चे, दोनों छोटे बच्चों से अधिक काबिल और होनहार थे। बड़ा भाई डॉक्टर बना। सरकारी नौकरी में रहा, साथ में post graduation भी की। फिर धीरे धीरे बरनाला के पास रामपुरा फूल नामक मंडी में अपना अस्पताल खोला और खूब सफल रहा। कंचन दीदी pharmacist बने और हमेशा सरकारी नौकरी में रहे। स्वप्न दीदी कोई career नहीं बना पाईं। फरवरी 1987 में जालंधर के एक रूढ़िवादी परिवार में उनकी शादी कर दी गई। उन्होंने अपने विवाहित जीवन में अपने घर से निकल कर नहीं देखा। माता पिता के घर को छोड़कर कहीं घूमने फिरने नहीं जा सके। मई 2007 में एक अंधा-धुंध कारचालक ने टक्कर मारकर उनकी हत्या कर दी। बाद में कारचालक के परिवार ने पंद्रह लाख रुपया देकर मामले को रफा-दफा कर दिया। मैं सोचता हूं कि अगर कोई मेरी बेटी को टक्कर मारकर मार दे तो क्या मैं धन लेकर संतोष कर लूंगा। यकीन के साथ तो नहीं कह सकता, पर मुझे लगता है कि शायद या तो मैं उसे माफ़ कर दूंगा क्योंकि जो नुक्सान होना था, वह तो हो गया, या उसे सज़ा दिलवाकर रहूंगा, या फिर कोई ऐसा काम करूंगा जिससे लोग दोबारा अंधा-धुंध गाड़ी न चला सकें। पर धन लेकर संतोष नहीं करूंगा। खैर, बात परिवार की चल रही थी। मैं पढ़ाई में बहुत होनहार नहीं था। पर 1986 में jet नामक engineering competition में मेरी किस्मत काम कर गई और मुझे चंडीगढ़ के punjab engineering college में प्रवेश मिल गया। सब लोग बहुत खुश थे। हालांकि बचपन से ही मेरा मन गाने बजाने में अधिक लगता है, पर संगीत में मैं कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सका। मेरे घर वालों की समाज में कद्र थी कि उन्होंने एक साफ़-सुथरा जीवन जीया है, जीवन-भर नौकरी कर के चार बच्चों को अच्छी पढ़ाई लिखाई दी, उनकी शादियां करवाई। मेरे पिता जी हमेशा दूसरों को कहा करते थे कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता। पर पता नहीं क्यों, जब सब ज़िम्मेदारियां लगभग समाप्त हो चुकी थीं, वे झूठ और धन के लालच की दल-दल में धंसने लगे। chronology: 1 अगस्त 1971 को मेरा जन्म। मेरा बचपन और युवावस्था पंजाब के बरनाला शहर में गुज़रे। 25 अक्तूबर 1985, कंचन दीदी की शादी। बरनाला में दसवीं करने के बाद अगस्त 1986 में 10+2 non medical पढ़ने के लिए मुझे चंडीगढ़ के dav college भेजा गया। मैं वहां hostel में रहा। यह उस समय एक बड़ा निर्णय था। यह मेरे भाई का निर्णय था कि चंडीगढ़ में मैं अच्छी शिक्षा ले पाउंगा। और क्योंकि वह खुद डॉक्टर था, इसलिए उसे लगता था कि मैं कमज़ोर दिल का हूं, मैडिकल नहीं कर पाऊंगा, इसलिए मुझे non medical में प्रवेश दिलाया गया। मेरे जैसे भाग्यशाली बच्चे बहुत कम थे जिन्हें माता पिता ने उच्च शिक्षा के लिए चंडीगढ़ भेजा हो। हॉस्टल में रहने का खर्च भी माता पिता को ही उठाना था। 15 फरवरी 1987, स्वप्न दीदी की शादी। शादी के कुछ दिन बाद जब दीदी को पहली बार जालंधर में ससुराल से वापस बरनाला में माता-पिता के घर लाना था तो उन्हें लेने जाने के लिए भईया मुझे साथ नहीं लेकर गए, बल्कि मनु को साथ लेकर गए। हमारे परिवार में अनेक स्थितियों में मनु पूजा को मुझसे अधिक वरीयता मिलती, जबकि चाचाजी और चाचीजी केवल मनु पूजा को ही पूछते थे, मैं उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था। दीदी का ससुराल एक संयुक्त परिवार था। दो भाई मिलकर कंपनियों के लिए accounting का काम करते थे, एक भाई वकील था। पर्यटन परिवार में किसी की भी dictionary में नहीं था। मेरे दीदी कभी कहीं घूमने नहीं जा सके। उनकी दुनिया केवल घर में रोटी पकाने तक सिमट गई। एक BA pass लड़की केवल रोटियां बनाने को रह गई। अगस्त 1988 में jet नामक competition में पर्याप्त अंक पाने के बाद चंडीगढ के punjab engineering college में मैंने प्रवेश पाया। इसी दौरान एक बचपन की दोस्त, एक खूबसूरत लड़की से मेरा थोड़ा बहुत प्रेम दोबारा चला। वह मेरे घर आती जाती, मैं उसके घर आता जाता। मैं उससे शादी करना चाहता था। पर वह सिख थी, और उसका परिवार हमसे अधिक संपन्न था। उसके पिता भी बिजली बोर्ड में किसी ऊंचे पद पर थे। मेरे पिता शायद उनके कभी साथी रहे पर धीरे धीरे पद के कारण उनके बीच gap आ गया था। मैं उस समय केवल सत्रह साल का था और मैंने इंजीनियरिंग में नया नया प्रवेश पाया था। मैं अपने माता-पिता से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। पता था कि यह हो नहीं सकेगा। क्योंकि मेरे माता-पिता हमेशा low profile में रहते थे। उनसे शायद इसके बारे में बात करने की हिम्मत नहीं होती। मैं डरपोक बना रहा। इस डरपोकता की बहुत बड़ी कीमत चुकाई और चुकाता रहूंगा। मुझे इंजीनियरिंग में खास रुचि नहीं थी, शायद इसलिए मैं इसमें बहुत अच्छे अंक नहीं ले पाया। वैसे भी उच्च शिक्षा हमारे देश में केवल काम-चलाऊ होती है। केवल अंग्रेज़ी में दी जाने वाली इन शिक्षाओं में इस बात पर ज़ोर नहीं दिया जाता कि छात्र को सचमुच कितना समझ आ रहा है, इसे वह वास्तविक जीवन में उपयोग करने में सक्षम हैं या नहीं, बस रट्टा लगाकर किसी तरह परीक्षा पूरी करनी होती है। शायद अच्छे अंक न पाने का कुछ हद तक कारण मेरी पहली प्रेम कहानी के असफल हो जाना भी था। सेक्स और प्रेम की भूख मन में बनी रही। यहां जर्मनी में देखता हूं कि लड़के लड़कियां छोटी उम्र से ही साथ रहने लगते हैं। पर हमारे समाज के लिए यह अकल्पनीय है। मेरे घर वालों के लिए तो यह सब दूसरी दुनिया की बातें थीं। हालांकि मेरे पिता चाचाजी को बहुत मानते थे जिन्होंने प्रेम-विवाह किया था, पर खुद सामंती ही रहे। 15 फरवरी 1989, भईया की शादी। भईया ने पहले दोनों दीदीयों की शादी करवाई। यह उनकी ideology थी कि पहले बहनों की शादी करवाएं, फिर खुद शादी करें। बहनों की शादियों का खर्च भी काफ़ी हद तक उन्होंने वहन किया था। 1992 में हमारा engineering batch पूरा हुआ। final year में campus interviews होने लगीं। पर मैं वहां कामयाब नहीं हो पाया। एक पेपर फंसने के बाद मैंने इंजीनियरिंग 1993 में पूरी की। इस, करीब एक साल के इंतज़ार के बाद मैंने लुधियाना में छोटी सी कंपनी में job शुरू की। सितंबर 1995 में मुझे रूपनगर में swaraj mazda में नौकरी मिली। इससे मैं चंडीगढ़ में मनु के साथ रहने लगा। वह भी चंडीगढ़ में अपनी पढ़ाई कर रहा था। चाचा जी का परिवार चंडीगढ़ से थोड़ी ही दूर परवाणु में रहता था। पूजा भी पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ में एक girls hostel में रह रही थी। मेरा career बहुत अच्छा नहीं चल रहा था। मेरे माता पिता भी मुझसे हताश थे। 1997 के शुरू में जब उन्हें लगा कि मैं करियर में कुछ खास आगे नहीं बढ़ पाऊंगा तो उन्होंने मेरी शादी करके अपने कर्तव्यों से निवृत्त होने की सोची। मैं अंतिम संतान था। मैं कोई धन भी जमा नहीं कर पाया था। इसलिए शादी का खर्च भी माता पिता को ही उठाना था। उन्होंने समाचार पत्रों में matrimonials निकालने शुरू कर दिए। उन्हें बहुत पढ़ी लिखी और नौकरी पेशा लड़की चाहिए थी। आखिर आने वाले पत्रों में से उन्होंने दो परिवार चुने। एक पटियाला की कोई graduate लड़की, छोटी मोटी नौकरी करने वाली और दूसरी अंबाला की post graduate (mca) लड़की, ठीक ठाक job करने वाली। उसके पिता भी sdo थे, जो मेरे clerical माता पिता के लिए बड़ी चीज़ थे। उन्होंने मन ही मन दूसरी लड़की यानि मोनिका के पक्ष में निर्णय ले लिया। मेरा भाई भाभी जी के साथ मोनिका को राजपुरा में उसकी कंपनी 'अमृत बनस्पति' में, जहां वह job कर रही थी, मिलकर आए। मुझे उसका फोटो दिखाया गया। मुझे लड़की कोई खास पसंद नहीं आई। मेरा भाई कहने लगा कि लड़की थोड़ी गहरे रंग की ज़रूर है पर इतनी भी बुरी नहीं है। मेरी मां को आभास भी हुआ कि मैं नाखुश हूं पर मेरे पक्ष में कोई बात नहीं हुई। मेरे घर वालों को पता था कि मैं बचपन से गाने बजाने का अत्यंत शौकीन हूं, मेरे लिए करियर से ज़्यादा जीवन में प्रेम और सुंदरता महत्वपूर्ण है। पर उन्होंने केवल practical बातें ही सोचीं। एक दिन मैं चंडीगढ़ में अपने कमरे में बैठा था कि मेरे पिता और मेरे भईया बरनाला से आए और मुझे और पूजा को लेकर अंबाला चल दिए। पूजा को साथ क्यों, किसी को आज भी नहीं पता। उसकी इस माजरे में कोई भूमिका नहीं थी। लड़की के परिवार के साथ मुलाकात पहले से तय कर रखी थी। वहां पहुंच कर मुझे सारा परिवार, ईमानदारी से बताऊं तो कतई पसंद नहीं आया। पर वहीं पर बिना अपनी राय रखे, बिना मुझसे राय पूछे, बिना समय मांगे, रिश्ता पक्का कर दिया गया। लड़की कोई ऐसी खूबसूरत नहीं थी जो मेरे जैसे हिंदी फिल्मी गानों के शौकीन को पसंद आ जाती। उसकी मां का चेहरा देखकर तो मन एकदम depress हो गया। तब लगा कि क्या मेरी कीमत यही है। खुद को आधुनिक कहने वाले मेरे घर वालों ने ऐसा मध्ययुगीन काम किया और मैं कुछ नहीं कर सका। मेरी ज़िंदगी का अंधेरा युग शुरू हो गया। मैं, जो जीवन भर हिंदी गाने गाता रहा, खूबसूरती के सपने सजाता रहा, मुझे ऐसे मेरी औकात दिखाई जाएगी, उम्मीद नहीं थी। एक बार मैं अपने भाई भाभी से मिलने चंडीगढ़ से पटियाला गया। रास्ते में राजपुरा शहर पड़ता था जहां मोनिका नौकरी कर रही थी। मुझे उससे मिलने का ख्याल नहीं आया। मेरे भईया भाभी इससे हैरान हुए कि मैं मोनिका से मिलकर क्यों नहीं आया। उन्होंने देखा कि मैं शादी को लेकर उत्साहित नहीं हूं, फिर भी कुछ नहीं किया। कुछ दिन बाद अपने hometown बरनाला में अपने माता पिता, भाई बहन के साथ मैंने मुद्दा फिर उठाया। मैंने समझाने की कोशिश की कि मुझे यह शादी अच्छी नहीं लग रही। खास कर लड़की का गहरा रंग मुझे बहुत खटक रहा था। पर मेरे पिता जी ने कहा कि हमारे जैसी निम्नवर्गीय परिवारों को ias लड़कियां तो मिलने से रहीं। मेरा भाई भी मुझे यह समझाता रहा कि पति पत्नी दोनों कमाते हों तो पैसा अधिक बचने लगता है। लड़की के बारे में केवल यह देखा गया कि वह mca है और नौकरी कर रही है। लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि वह आगे भी नौकरी करेगी, या करना चाहेगी, इसपर कोई चर्चा नहीं हुई। पता नहीं क्यों बहुओं से नौकरी करवाने का शौक मेरे घरवालों को बहुत रहा है। मेरे भाभी जी भी अच्छा पढ़े लिखे थे, पर नौकरी करने की उन्होंने कभी नहीं सोची थी। उन पर भी शादी के बाद नौकरी के लिए दबाव डाला जाने लगा। कुछ दिन बाद रूपनगर में अपने कार्यालय से मैंने फोन करके पिताजी से कहा भी कि मैं यह शादी नहीं करना चाहता। पर उन्होंने कहा कि अब को कार्ड भी बंट गए हैं। 13 अप्रैल 1997 को हमारी शादी कर दी गई। मेरे लिए यह काला दिन था। उस दिन भी मैंने घर से भाग जाने की सोची थी, पर पता नहीं क्यों रुक गया। यह शादी मेरी ज़िंदगी की पहली सबसे गंभीर गलती थी। शादी के बाद मोनिका ने मोहाली में, जहां हम रहते थे, एक छोटी मोटी नौकरी मिलने पर उसने अमृत बनस्पति को छोड़ दिया। बाद में मोहाली में ही उसे swaraj group की ptl कंपनी में नौकरी मिल गई। यह अच्छी नौकरी थी। पर मैं इस शादी से बहुत निराश था। मोनिका का गहरा रंग मुझे लगातार चुभता रहता। मैं उसके साथ कहीं बाहर नहीं निकलता था। उसके साथ कहीं जाने में मुझे बहुत झिझक होती। एक बार मैंने एक पड़ौस के अभिनय के शौकीन लड़के के साथ मिलकर एक लोकल नाटक में भाग लिया। नाटक देखने उसकी खूबसूरत बहनें और परिवार भी जा रहा था। मुझे मोनिका को साथ ले जाने की हिम्मत नहीं हुई। उसने उस दिन घर में अकेले शराब पी। इस तरह धीरे धीरे मेरा सामाजिक जीवन लगभग खत्म हो गया। सारे दोस्तों से मेरा रिश्ता टूट गया। मेरा उसके परिवार वालों से मिलने का भी मन नहीं करता था। खासकर उसकी मां तो बदसूरती का नमूना थी। उसके भाई और पिता वैसे ही मेरी सोच के नहीं थे। दरअसल मेरी सोच और उन लोगों की सोच में कुछ भी common नहीं था। मेरा career बहुत अच्छा नहीं था, पर मैं चंडीगढ़ में अकेला रहता था। शायद यही मोनिका के घरवालों को सबसे अच्छा लगा कि मैं अपने परिवार के साथ नहीं रहता। अगर मैं अपने माता पिता के साथ बरनाला में रह रहा होता तो शायद वे लोग शादी के लिए राज़ी न होते। मैंने जब अपना दुख पिताजी को ज़ाहिर किया तो उन्होंने बहुत bluntly कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता। अब भूल जाओ। मेरे मम्मी पापा खुशी से हमारे पास आकर रहते थे पर मेरी निराशा उन्हें नहीं दिखती थी। 13 अप्रैल 1998 को हमारी शादी की पहली सालगिरह पर मेरे माता पिता आशा कर रहे थे कि हम लोग यह दिन बरनाला जाकर उनके साथ मनाएंगे। पर मोनिका ने कहा कि हम लोग बरनाला न जाकर अकेले में कहीं जाकर पहली सालगिरह मनाएं। मैं उत्साहित नहीं था। पहले तो मैं उसके साथ खुश नहीं था, उसके साथ कहीं भी जाकर मैं खुश नहीं हो सकता था। दूसरे मेरे माता पिता को दुखी करना मुझे ठीक नहीं लग रहा था। पर मैं कुछ कर नहीं पाया। हमने पहाड़ों में परवाणु से कुछ आगे timber trail नामक जगह पर जाकर यह दिन मनाया पर मेरे लिए यह शाम अच्छी नहीं थी। अगस्त 1998 में मुझे महिंद्रा एंड महिंद्रा, मुंबई में नौकरी मिली। तब वह कंपनी scorpio गाड़ी को बाज़ार में लाने की कोशिश कर रही थी। जब मैंने बताया कि मैं शादी शुदा हूं तो तो मुझे मुंबई में फ्लैट भी दिया गया। चंडीगढ़ से पहली बार मुंबई के लिए रवाना होते हुए मेरे मम्मी ने मेरी पत्नी के खिलाफ कुछ गलत बोला जो मुझे अच्छा नहीं लगा। लेकिन हम लोग सह गए। मेरे चाचा चाची भी उस समय साथ थे। मैं मुंबई चला गया। मेरे घरवालों को पता था कि मैं मोनिका से प्यार नहीं करता। इसलिए वे उसे कुछ कहने, या कम से कम उसके बारे में कुछ कहने के मौके ढूंढते रहते थे। मेरे भाभी जी भी इस मामले में कम नहीं थे। मैं मोनिका से प्यार नहीं करता था पर मुझे उसके साथ सहानुभूति थी, क्योंकि वह भी अपने घर वालों की गलती के कारण इस आग में जल रही थी। इसलिए मेरे घर से कोई उसे कुछ कहता तो मुझे अच्छा नहीं लगता था। मेरा भाई तो मुझे यह समझाता रहता कि मैं उसे काबू में नहीं रखता। कभी कभी वह उससे ऐसे बात करता जैसे उसे जानवर की तरह खरीद कर लाए हों। मेरे मम्मी को तो बहुएं कभी रास नहीं आईं। उन्होंने तो भाभी जी पर भी तरह तरह की टिप्पणियां करके उनका मन बुरी तरह ज़ख्मी कर दिया है। मुंबई पहुंचने के बाद मोनिका के साथ थोड़ा पत्र व्यवहार चलता रहा। ईमेल इंटरनेट उस समय इतने widespread नहीं थे। मोनिका अभी थी ptl में नौकरी कर रही थी। उसके माता पिता और दोनों भाई भी चंडीगढ़, पंचकुला और अंबाला में रहते थे और मोहाली से दूर नहीं थे। इसलिए वह लगातार अपने घर वालों के संपर्क में थी और हमारे बीच की अनबन के बारे में अपनी माता पिता को सबकुछ बताती थी। तब तक हम दोनों में साफ़ हो गया था कि हमारी शादी एक भूल थी। मोनिका का भी मन मुझसे उखड़ चुका था। उसके पास secure job थी, घर वालों से भी दूर नहीं थी। इसलिए उसने मुझे चिट्ठी द्वारा पूछा भी कि क्या उसे भी मुंबई आना चाहिए या चंडीगढ़ में ही रहना चाहिए। फिर भी मैंने उसकी अच्छी भली job छुड़वा कर मुंबई बुलवा लिया। मेरी दूसरी सबसे बड़ी भूल। मोनिका के आने के बाद मैं अत्यंत दुखी रहा। मैं अलग रहना चाहता था। अक्सर मैं पिता जी को याद करके रोता था कि उन्होंने मुझे इस दलदल में क्यों फंसाया है। मेरे भाई ने भी मेरे साथ कभी सहानुभूति नहीं जताई, मुझे कभी फोन नहीं किया। मोनिका मुझसे इतनी तंग थी कि एक बार उसने बहुत सारे नींद के कैपसूल खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की, पर बच गई। मेरे मन में हमारी ऊंची इमारत से कूद कर जान देने का विचार आया था, पर हिम्मत न कर सका। मुंबई शहर हालांकि मेरे लिए बहुत aggressive था, बहुत गंदगी और भीड़ थी। पर वहां भी मैंने कई सपने संजोए थे। खासकर वहां जाकर मैंने अपना पहला बड़ा synthesiser और percussion pad खरीदा, midi तकनीक द्वारा उन्हें कंप्यूटर के साथ जोड़ना सीखा, कई हिंदी गानों की धुनें कंप्यूटर पर बनानी शुरू की। कुछ professional लोगों के साथ मिलकर मैंने थोड़ा बहुत काम किया। एक स्टेज कार्यक्रम के लिए भी मैंने धुन तैयार की। फरवरी 2000 में, scorpio project का designwork लगभग खत्म होने पर मुझे बंगलौर में एक engineering consulting company में नौकरी मिल गई। मैं चला गया। तब तक मोनिका को मुंबई में l&t कंपनी में नौकरी मिल चुकी थी। फिर भी मैंने उसे बंगलौर में नौकरी ढूंढने के लिए कहा। उसने अधमने से कोशिश भी की। नौकरी नहीं मिली। मेरे साथ रहना उसकी भी इच्छा नहीं थी। वह मुंबई में ही रही। जून 2000 में आखिर मोनिका को अमरीका की एक भारतीय bodyshopping कंपनी में नौकरी मिल गई। मुंबई से हमारा सारा सामान हरियाणा में उसके माता पिता के घर पहुंचा दिया गया। वहां से उसके माता पिता, उसके भाई, मेरे माता पिता, भाई बहन, चाचा चाची और मैं उसे दिल्ली हवाई अड्डे पर विदा करने गए। जाते हुए उसने कहा 'चलो अब खुश रहो।' और उसके जाते ही मेरे मम्मी ने कहा 'चलो पीछा छूटा'। मैं उन दोनों के ये शब्द कभी नहीं भूलूंगा। इसके बाद मैं बंगलौर में खुश रहा। शायद मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यहीं गुज़रा। यहां मैंने एक बंगाली समूह के साथ मिलकर बहुत सारी धुनें बनाईं, कई स्टेज कार्यक्रम दिए। zee tv के कई कार्यक्रमों में जाने का मौका मिला। यहीं पर एक बार मम्मी पापा, कंचन दीदी, जीजाजी, उनकी बेटी नन्नू और भइया की बेटी रुबू कुछ हफ्तों के लिए मेरे पास बंगलौर में रहने आए। मैं अपने माता पिता से बहुत नाराज़ था। बात छेड़ने उन्होंने केवल इतना कहा कि उन्हें क्या पता था कि ऐसा होगा। यानि वे भी मोनिका के जाने के बाद राहत महसूस कर रहे थे। पर मेरे भविष्य का क्या होगा, इसपर कोई चर्चा नहीं हुई। मुझपर तो विवाहित होने का ठप्पा लग चुका था। जनवरी 2001 में मेरी बंगलौर वाली कंपनी की ओर से मेरा जर्मनी जाना तय हो गया। म्युनिक पहुंचने के बाद करीब एक डेढ महीना कंपनी ने हमें होटल में रखा। मैं अपने पुराने संपर्क टटोल रहा था तो अचानक मुझे किसी लखविंदर सिंह का कार्ड दोबारा दिखा जिसमें पता म्युनिक का था। 1995 में वह चंडीगढ़ आया था। उसने अखबार में संगीत पसंद लोगों के लिए इशतिहार निकाला था। मैं interview देने गया था। इस तरह मेरी उससे जान पहचान हुई थी। पर म्युनिक कौन सी जगह है, उस समय मुझे नहीं पता था। पर मैंने उसका कार्ड संभाल लिया था। म्युनिक पहुंचकर जब मैंने उस कार्ड में लिखे नंबर को घुमाया तो वह नंबर लग गया। अब यह बात छह साल पुरानी हो चुकी थी। दोनों को एक दूसरे के बारे में और एक दूसरे की शक्ल बिल्कुल याद नहीं थी। उसने मुझे अपने रेस्त्रां में आकर मिलने के लिए कहा। मैं शहर के बीचों बीच, isar नदी के किनारे स्थित उसके रेस्त्रां में उससे मिलने गया। हमें एक दूसरे को मिलकर बहुत खुशी हुई। वह पंजाबी था, भारतीय रेस्त्रां चलाता था, पर उसे संगीत का बहुत शौक था और professional singer बनना चाहता था। उसने रेस्त्रां के ऊपर ही चार कमरे का फ्लैट दिखाया जिसमें वह अपनी estonia की एक गर्लफ्रेंड के साथ रहता था। उसने मुझे वहां एक कमरा किराए पर देने का प्रस्ताव दिया। वह एक कमरा अपने लिए रखकर बाकी तीनों कमरे किराए पर देने की सोच रहा था। मैंने म्युनिक पहुंच कर एक ही महीने में कई लोगों के साथ जान पहचान कर ली थी। कई अंग्रेज़ी ग्रुप्स में जाने लगा, म्युनिक की music की दुकाने छान मारीं। यहां मैंने देखा कि संगीत से संबंधित न केवल हर तरह के वाद्य, बल्कि music studio से संबंधित हर तरह की equipment मिलती है जिसके बारे में मुंबई या बैंग्लौर में सोचा भी नहीं जा सकता था। लखविंदर को भी मेरी यह बात पसंद आई कि मुझे संगीत और संगीत संबंधी तकनीक की अच्छी समझ है, इसलिए वह भी मुझे छोड़ना नहीं चाहता था। एक ऐसी ही दुकान पर जब मैं एक जर्मन salesman लड़के के साथ बात कर रहा था तो उसने कहा कि वह कमरा तलाश रहा है। मैंने उसे लखविंदर से बात करने को कहा। मुझे यह सोच कर अच्छा लगा कि अगर यह लड़का साथ रहेगा तो संगीत संबंधित तमाम तकनीक मेरे हाथ में आ जाएगी। उसने लखविंदर से बात करके एक कमरा किराए पर ले लिया। उसने फटाफट अपना कमरा renovate किया, अपना तमाम studio का सामान लेकर आया और रहने लगा। मुझे अपना कमरा renovate करने में बहुत दिक्कत हुई क्योंकि यह इमारत पुरानी थी। दीवारों से सीमेंट उखड़ रहा था। शायद लखविंदर का भारतीय परिवार कभी इस फ्लैट में रहा था। तब का पुराना furniture कमरे में था। एक बार एक लड़की से मेरी जान पहचान हुई पर वह मेरे कमरे की हालत देखकर भाग गई। मैंने उसे कुछ पुराने हिंदी गाने सुनाकर भारतीय संगीत से परिचित करवाना चाहा, पर ये धुनें भी उसके गले नहीं उतरीं। फिर हमें ज़रूरत थी चौथे tenant की, क्योंकि करीब 2000 d-mark हम चार जनों ने बांटने थे। यह जर्मनी की मूल मुद्रा का अंतिम वर्ष था, क्योंकि 2002 से यहां यूरो लागू हो गया था। उस समय एक d-mark की कीमत बीस भारतीय रुपए थी। मैंने और उस लड़के ने मिलकर अखबार में इश्तिहार निकाला और interview के लिए एक शाम तय की। उस शाम बहुत सी लड़कियां interview के लिए आईं। सबने अपना थोड़ा थोड़ा परिचय दिया। हमने basic से सवाल पूछे कि आप यह कमरा क्यों लेना चाहती हैं, आपने अपने बालों का रंग लाल क्यों बनाया है आदि आदि। आखिर lufthansa की एक air hostess को कमरा देने का हमने निर्णय किया। पर थोड़े दिन बाद उसे कहीं और जाना पड़ा, इसलिए कमरा किसी और लड़की को दे दिया गया। उस लड़की ने भी तुरंत अपने कमरे में नया पेंट किया और खूब सजा लिया। जर्मन लोग हाथ से काम करने में बहुत तेज़ होते हैं। मैंने अपना कमरा पेंट करने की बहुत कोशिश की पर कर न सका। एक दिन लखविंदर ने मुझे साथ ले जाकर कमरे का सारा पुराना furniture फेंक दिया और एक अच्छी दिखने वाली अल्मारी दे दी। इसी बीच मोनिका का अमरीका से कुछ दिन के लिए जर्मनी आने का कार्यक्रम बन गया। फिर मैंने किसी तरह अपने कमरे को पेंट किया, नया कालीन खरीदकर बिछाया उसे कमरे को ठीक किया। उसके आने से मैं खुश नहीं था पर केवल कुछ दिनों की बात थी, इसलिए सह गया। हम लोग पैरिस आदि घूमकर आए। फिर वह वापस चली गई। इसी बीच जुलाई 2001 में, यानि मेरे जर्मनी आने के छः महीने बाद अचानक मेरे कन्नड़ सहकर्मियों की कारस्तानी के चलते मेरा projectwork खत्म करवा दिया गया। मुझे भारत वापस जाना था। पर एक जर्मन दोस्त की मदद से मुझे एक लोकल कंपनी में नौकरी मिल गई। अब मैं बहुत खुश था। मेरे पास पैसा, फ्लैट और आज़ादी थी। मैं अपनी इस नई लगभग खुद की बनाई दुनिया में बहुत खुश था। एक तो किफायती, शहर के बीचों बीच, नदी के किनारे घर किस्मत-वालों को ही मिलता था। ऊपर से साथ रहने वाले सभी लोग मेरी choice के थे। फिर नौकरी की ओर से भी कोई चिंता नहीं थी। इसके अलावा मेरा एक जर्मन दोस्त बन गया था जिसने अपने घर में बहुत बड़ा music studio बना रखा था। वह कई एल्बमों पर काम कर चुका था और बतौर डीजे भी काम करता रहता था। दुनिया भर का तकनीकी सामान था उसके फ्लैट में। उसके साथ मैं कई बढ़िया night parties में गया। उसने मेरा भी इस दिशा में कुछ मार्गदर्शन किया। पर इस दौरान मेरा भाई फोन कर कर के कहने लगा कि मुझे मोनिका को अपने साथ जर्मनी में बुलाना चाहिए। मेरी खुशी की उसे कोई परवाह नहीं थी। उसे और माता पिता को अपना झूठ खुलने का डर सताने लगा। वैसे भी क्योंकि उन्होंने कभी खुद इश्क नहीं किया था, इसलिए मैं ऐसा कुछ करूं, उनसे सहन नहीं हो पा रहा था। अपनी सामंती जीवनशैली के साथ रूबरू होने के लिए वे तैयार नहीं थे। मेरा भाई एक अच्छा डॉक्टर होने के बावजूद मन से एकदम सामंती है। उसे खुद पढ़ा लिखा होने पर गर्व है, आम salesmen या दुकानदारों को तो वह दोयम दर्जे के लोग समझता है। और इश्क-विश्क तो न मेरे बाप और मेरे भाई के एजेंडे में कभी रहा। सेक्स या प्यार के बारे में वे कभी सहजता से बात नहीं कर सके। मैं भी उनके डर से चाहते हुए भी हिम्मत न कर सका। इसलिए वे चाह रहे थे कि मैं जिस जेल से मुश्किल से, किस्मत से और साढे तीन साल की यातना के बाद निकला था, वापस उसी में चला जाऊं, और वे अपने झूठ के साथ आराम के साथ जी सकें। बदकिस्मती ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मोनिका के वापस जाते ही अगले दिन उसका फोन आ गया कि उसकी नौकरी छिन गई है। उसे कुछ ही दिनों में अमरीका छोड़ना पड़ेगा। वह मुझसे खुद को जर्मनी बुलाने के लिए आग्रह करने लगी, जिसके लिए मुझे कुछ कागज़ scan करके fax करने थे। मैं ऐसी स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। मेरे कुछ जर्मन दोस्तों ने मेरी कहानी सुनने के बाद ऐसा न करने की सलाह दी। पर पता नहीं क्यों, एक तो उन दिनों मोबाइल और ईमेल का चलन ज़ोर पकड़ रहा था। इन नए माध्यमों को मैं नज़रअंदाज़ नहीं कर सका और हमेशा पहुंच में रहता था। मोनिका और घरवालों ने फोन कर करके मुझे तंग कर दिया। मेरे घर वालों ने खुद कभी इश्क नहीं किया। उन्हें खूब पढ़े लिखे होने और आधुनिक होने का भ्रम रहता पर प्रेम प्यार की बातें उनकी dictionary से बाहर थीं। चाचाजी के बारे में भी वे यही कहा करते थे कि वे अस्पताल में नर्सों के साथ इश्क लड़ाते रहते हैं। अगर मैं भी ऐसा करता तो उन्हें इस सच को पचाने में बहुत दिक्कत होती कि उनकी ज़िंदगी बेकार चली गई है और मेरी शादी सचमुच ज़बरदस्ती कर दी गई है। इसलिए वे मुझ पर मोनिका को जर्मनी बुलाने पर दबाव डालने लगे। मेरा भाई तो लगभग रोनी सी आवाज़ बनाकर यह कहने लगा कि हमारी संस्कृति में तो गैरों को भी पनाह देते हैं, और तुम अपनी पत्नी को नहीं बुला सकते। उस समय वह अभी struggling phase में था। यही भाई ने बाद में 2009 में मुझसे कहा कि भाई बहन तो केवल नाम के होते हैं। आखिर मैंने अपनी मर्ज़ी के विरुद्ध उसे जर्मनी बुला लिया, केवल इसलिए कि उसे भारत वापस न जाना पड़े। पर सभी ने इसे उसका हक और मेरा फर्ज़ समझा। मैं एक बार फिर असहाय हो गया। वह मेरी नई हसीन दुनिया में अचानक आकर चौकड़ी मारकर बैठ गई। मेरी नए देश में बनाई छोटी सी नई दुनिया, जिसे मैंने बड़े अरमानों और उमंगों के साथ बनाया था, एकदम से तबाह हो गई। सब नए दोस्त खत्म हो गए। कुछ समय तक मोनिका का खर्च मैंने उठाया। आखिर मैंने उसे इस फ्लैट को छोडकर नए फ्लैट में shift कर लिया। कहने को शायद यह कोई बड़ी बात न हो पर मेरे दिल को कितना धक्का लगा, मैं ही जानता हूँ। किसी को इससे कुछ लेना देना नहीं था। अगर उस समय मैं उसे जर्मनी नहीं बुलाता तो आज मोनिका, उसके घर वाले और मेरे घर वाले बर्बाद होते और मैं आबाद होता, न ही मुझे कोई छू सकता था। पर मेरे ऐसा करने से आज सब आबाद हैं और मैं बर्बाद हूं। लाचार होकर मोनिका ने karlsruhe नामक शहर में एक कामचलाऊ नौकरी ढूंढ ली और वहां रहने लगी। मैंने अगले दो सालों तक उससे अलग रहने की कोशिश की, पर उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह मुझे ईमेल भेज भेज कर, फोन कर कर, या खुद बिना बताए मेरे यहां आ आकर मुझे तंग करती। एक बार मेरे यहां आकर मेरे लिखे गए बहुत सारे personal notes चोरी करके चली गई। मेरा एक लड़की के साथ थोड़ा बहुत affair चला था जो उसके बार बार आ धमकने के कारण खत्म हो गया। इसके बाद मोनिका के भाई की पुलिस की धमकियों के साथ emails आने लगीं। स्वप्न दीदी बार बार ईमेल भेजने लगीं कि पापा मम्मी के घर पुलिस पहुंच गई तो जीवनभर में समाज में कमाया आदर और नाम मिट्टी में मिल जाएगा। वे बहुत बूढे लगने लगे हैं आदि। एक बार आ जाओ, यहां बैठकर मामला निपटा लेंगे। भाई, जिसने नया नया अस्पताल शुरू किया, कहने लगा कि अगर मैं मोनिका के साथ नहीं रहूंगा तो उसके और परिवार द्वारा की गई अब तक थोड़ी बहुत प्रगति भी मिट्टी में मिल जाएगी। पापा भी फोन करने लगे कि एक बार भारत आ जाओ, हम तुम पर बिल्कुल भी दबाव नहीं डालेंगे। यहां यह कहना महत्वपूर्ण है कि इनमें से किसी ने भी आपस में बैठकर बातचीत नहीं की, खासकर मेरे और मोनिका के परिवार वालों ने। सब मुझे ही धमकाते रहे, दुहाईयां देते रहे। किसी में इतनी moral हिम्मत नहीं थी अपनी गल्तियों को स्वीकार कर एक दूसरे के सामने बैठकर मुसीबत का हल निकालने की कोशिश करते। जुलाई 2003 में मैं तीन सप्ताह के लिए अमरीका मनु और पूजा से मिलने गया। वहां पूजा ने बताया कि मेरे माता पिता शादियां करवाने से अभी भी बाज नहीं आए हैं। उन्होंने तो उसके लिए अपने किसी डॉक्टर दोस्त 'लक्षमण दास गुप्ता' के बेटे को purpose किया है जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं। मुझे इस बात पर बहुत दुख हुआ कि इस सबसे कुछ सीखने की बजाए वे अभी भी अपनी करतूतों पर कायम हैं। क्योंकि कुछ गलत होने पर ज़िम्मेदारी लेने को वे लोग तैयार नहीं होते, केवल रिश्ते करवाने में आगे रहते हैं। आखिर सबके दबाव में आकर अगस्त 2003 में जर्मनी आने के बाद मैं पहली बार भारत गया। मोनिका को भी पता चल गया। उसने भी फटाफट भारत का टिकट बुक किया और पीछे पीछे भारत आ गई। फिर उसने और उसके भाइयों, पिता, चाचा और मामा ने मिलकर हमारे घर पर धावा बोल दिया। उन्होंने और मेरे घरवालों ने मुझे डरा डरा कर और अपने जीवन की दुहाईयां देकर मुझे मोनिका के साथ रहने को मनवा लिया। मुझे डराया गया कि अगर मैं नहीं माना तो वे मुझे वापस जर्मनी नहीं जाने देंगे। मेरे पिता यह भूल गए कि उन्होंने कहा था कि भारत आने पर मुझ पर कोई दबाव नहीं डाला जाएगा। बल्कि कहने लगे कि क्या तुम हम लोगों की बर्बादी चाहते हो? मुझे पापा पर बहुत गुस्सा आया। मेरा मन उन्हें पीटने का भी हुआ, पर मैं हाथ उठाते उठाते रुक गया। मैं समर्पण करके जर्मनी लौट आया। मेरा अभी जर्मनी में वीज़ा पक्का नहीं हुआ था। इसी यात्रा के दौरान पता नहीं कैसे, शायद धोखे से मोनिका गर्भवती हो गई। मुझे वापस जर्मनी आने के बाद इस बात का पता चला। उसके जर्मनी आने के बाद और उसके गर्भ का पता चलते ही उसे नौकरी से भी निकाल दिया गया। बात फिर मेरे ऊपर आ गई। मुझे रहने के लिए नया बड़ा फ्लैट ढूंढना पड़ा जिसमें मेरा खूब पैसा डूब गया। भारत जाना मेरे लिए फिर से बहुत बड़ी गलती साबित हुआ। मुझे उन लोगों को मरने देना चाहिए था। मोनिका का बड़ा भाई tension के मारे diabetes का शिकार हो गया था, छोटा भाई सूख कर कांटा हो गया था। मोनिका ने अपना बुरा हाल कर रखा था। उसने अपने बाल भूरे रंग से रंग लिए थे। eyebrows को बहुत पतला कर लिया था, बहुत ही अजीबो गरीब कपड़े पहनने लगी थी। उसकी यह हालत देखकर भी मुझे उसपर तरस आता था। उसके भविष्य की कोई आस नज़र नहीं आती थी। मुझे सोचना चाहिए था कि जिस परिवार ने मुझे पुलिस के डर पर साथ रहने को बाध्य किया उनके साथ मैं रिश्ता कैसे जोड़ सकता हूं, उन्हें अपना कैसे मान सकता हूं। इस समर्पण का परिणाम मेरी पूर्ण रूप से बर्बादी के रूप में सामने आया। इसकी सज़ा कभी खत्म नहीं होगी, बल्कि बढ़ती जाएगी। इसके बाद मेरा करियर लगभग चौपट हो गया क्योंकि मुझपर मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि मैं अपनी नौकरी पर ठीक तरह से ध्यान नहीं दे पाया। आखिर जून 2004 में म्युनिक में cesarean operation द्वारा मेरी पहली बेटी श्रेया का जन्म हुआ। मैं उसके जन्म से बहुत खुश था। पर मेरे जीवन में बहुत गहरा अंधेरा छा चुका था। मेरी हर उम्मीद खत्म हो चुकी थी, हर हसरत पर पानी फिर चुका था। मोनिका भी job छोड़कर पूरी तरह मुझपर निर्भर हो गई थी। मेरी आज़ादी और मेरी कमाई अब मेरी नहीं रही। अब बच्चों की ज़िंदगी महत्वपूर्ण है। 2005 में इंटरनेट में हिंदी ब्लॉगिंग का चलन शुरू हुआ। यह प्रचलन एक ताज़े झोंके की तरह आया। मुझे जर्मनी की यह चीज़ शुरू से ही भा रही थी कि प्रगति के लिए विदेशी भाषा पर निर्भर होना ज़रूरी नहीं। बल्कि असली प्रगति केवल अपनी भाषा में ही की जा सकती है। अब युनिकोड के चलते भारतीय भाषाओं का भविष्य भी कुछ नज़र आने लगा था। लोगों को अभिव्यक्ति का एक माध्यम मिलने लगा। कंप्यूटर, इंटरनेट पर हिंदी नज़र आने लगी जो पहले की तरह विभिन्न तरह के fonts पर निर्भर नहीं थी। मैं भी इसमें सक्रिय हो गया और दूसरे bloggers के साथ विचार-विमर्श करने लगा। मैंने थोड़ी बहुत php, mysql programming सीखी और इसकी मदद से इंटरनेट पर कुछ उपयोगी उपकरण बनाए। मुझे कम से कम किसी ओर से संतुष्टि मिलने लगी। अगस्त 2006 में जब हम श्रेया के जन्म के बाद पहली बार भारत गए तो मैंने यह तकनीक घर वालों को भी दिखाई, पर उन्होंने कोई उत्साह नहीं दिखाया। मैंने बरनाला के कॉलेज और एक कंप्यूटर सेंटर में युनिकोड के बारे में व्याख्यान भी दिए। पर इस यात्रा से कुछ दिन पहले गल्ती से फिर मोनिका गर्भवती हो गई। इसलिए भारत यात्रा मेरे लिए सरदर्द बन गई क्योंकि मैं जल्द जल्द जर्मनी वापस जाकर इस जन्म को रोकना चाहता था। पर अब देर हो चुकी थी। इस यात्रा के दौरान मैं मोनिका के घर वालों से बिल्कुल मिलना नहीं चाहता था पर मन मार कर उनसे मिलना पड़ा, उनके साथ कई दिन बिताने पड़े। मई 2007 में मेरी दूसरी बेटी मेधा का जन्म हुआ। उसके जन्म के कुछ दिन पश्चात भारत में स्वपन दीदी का एक दुर्घटना में देहांत हो गया। अब जर्मनी में चार लोगों का वित्तीय भार और उनके जीवन की पूरी ज़िम्मेदारी मुझ अकेले पर आ पड़ी। जर्मनी में मैं ऐसे जीवन के लिए कतई तैयार नहीं था जो मुझ पर थोप दिया गया। वह भी तब जब मैं ऐसे परिवार के साथ रिश्ता बनाना नहीं चाहता था। अब मोनिका का करियर तो वैसे ही खत्म हो चुका है, क्योंकि न तो उसका नौकरी करने का मन है, ऊपर से इतने सालों में तकनीक बहुत आगे निकल गई है। मेरे लिए भी किसी बेहतर job के लिए दूसरे शहर में जाना असंभव हो गया है क्योंकि बच्चे अब स्कूल और किंडरगार्टन जाने लगे हैं। सबकुछ बहुत बंध गया है। मेरी परिस्थितियां मेरी हर तरह की प्रगति में बाधा बन रही हैं। मैं blogging से आगे बढ़कर जर्मनी में कोई हिंदी पत्रिका शुरू करना चाहता था। कई बार मैंने विभिन्न हिंदी bloggers के साथ तालमेल करके छोटी मोटी home printed पत्रिकाएं छाप कर बांटने की कोशिश की। इसका नाम बसेरा रखा। पर यह केवल दो a4 आकार के पृष्ठों की होती, black and white होती, और केवल laser printed होती, रूप सज्जा भी unprofessional होती, इसलिए यह लोगों में कोई उत्साह नहीं जगा पाई। फिर blogging द्वारा ही मध्यप्रदेश के सतना ज़िले से नवभारत टाइम्स के एक पत्रकार रमाशंकर से परिचय हुआ। उन्होंने मुझे cmyk में offset printing द्वारा पत्रिका छापने का सुझाव दिया। layout का ज़िम्मा वे उठाने को मान गए। अभी कोई भी layout program युनिकोड का समर्थन नहीं कर रहा था जबकि इस सारे concept का central point ही युनिकोड था, क्योंकि मैं हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों को देवनागरी की बजाए रोमन लिपि में लिखना चाहता था। पर हमने किसी तरह यह project start किया। दिसंबर 2007 में हमने बसेरा का पहला रंगीन और 24 पृष्ठों का अंक निकाला। यह अंक केवल laser printed था, इसलिए केवल तीस प्रतियां छपीं थीं। अभी तक offset printing के लिए शोध पूरा नहीं हुआ था। फिर जनवरी 2008 में हमने पहला offset printed अंक निकाला। और इस अंक की सामग्री जुटाने के लिए मैंने बहुत मेहनत की। यह महंगा project था क्योंकि offset printing के लिए कम से कम ढाई सौ प्रतियां छपवानी पड़नी थी जिसकी कीमत लगभग छह सौ यूरो थी। यह अंक उस समय एक क्रांति साबित हुआ। लोग उस समय सोच भी नहीं सकते थे कि ऐसा कुछ हो सकता है। लोकल खबरें और लेख हिंदी में, वह भी उच्च स्तरीय, रंगीन और glossy पत्रिका के रूप में। हालांकि इसे एक commercial success बनाने में हमें तीन साल लग गए पर इसने 2010 के अंत तक पूरे जर्मनी में धाक जमा ली। पर अगस्त 2010 में मेरी भारत यात्रा के दौरान मेरे घरवालों के पतन ने और उसके बाद की कुछ घटनाओं ने मेरा दिल पूरी तरह तोड़ दिया। अब मुझमें इस पत्रिका को आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं रही। अब मैं इंजीनियर के तौर पर अपने करियर पर ध्यान देना चाहता हूं, आगे बढ़ना चाहता हूं, पैसा कमाना चाहता हूं और खूब ऐश करना चाहता हूं। मेरे पिता और भाई, दोनों ही पढ़े लिखे होने के बावजूद अत्यंत रूढ़िवादी हैं। या शायद बढ़प्पन दिखाना उनकी nature में रहा है। वे ईमानदार और साफ सुथरे ज़रूर हैं पर इसकी पूर्ति वे अपना बढ़प्पन दिखा कर करते रहे हैं जिसमें तर्क वितर्क के लिए जगह नहीं होती। वाद विवाद करना उनका आदर न करने के समान समझा जाता रहा है। उन्हें यह लगता है कि उनसे ज़्यादा समझदार और ईमानदार कोई नहीं। इसके विपरीत मेरे चाचाजी का परिवार काफ़ी आधुनिकतावदी है। डॉक्टर होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपने पेशे को कई बार दांव पर लगाया। शायद मेरे पिता और भाई के लिए अपनी रूढिवादिता के कारण लिए गए निर्णयों की ग्लानी से निकलने का तरीका था मेरे चाचाजी के परिवार को भगवान की तरह मानना। 2009 में easter की छुट्टियों में मोनिका और दोनों बच्चे एक महीने के लिए भारत गए। मुझे केवल अंतिम सप्ताह में उन्हें वापस लेने के लिए भारत जाना था। वहां जाकर पता चला कि जब से मोनिका और मेरे बच्चे बरनाला में मेरे मम्मी पापा के पास हैं, उन्हें बठिंडा से कंचन दीदी और उनका परिवार या रामपुरा से भइया और उनका परिवार मिलने नहीं आया। केवल जिस दिन मैं पहुंचा उसी दिन सब लोग वहां आ गए। मुझे पता चल गया कि मेरे घरवालों को बर्बादी से बचाने के लिए बसाए गए मेरे परिवार की अब मेरे घरवालों में ही कोई कीमत नहीं है। यही नहीं, शादियां करवाने का शौक उनका अब भी नहीं गया था। पिता जी और जीजाजी (कंचन दीदी के पति) मुझसे कहने लगे कि उन्होंने लुधियाना में रह रहे मेरे मामा जी (शशि सिंगला) की बेटी के लिए लड़का सुझाया था, उन्हें पसंद नहीं आया, बल्कि हमसे बातचीत बंद कर दी। मैंने उन्हें कहना चाहा कि इतनी ज़िंदगियां खराब करके भी आपका इस खेल से मन नहीं भरा, पर जीजाजी के साथ होने के कारण मैं कुछ कह नहीं सका। पर इन सब लोगों के लिए अब मेरे मन में कोई आदर नहीं है। बल्कि अगर वे मेरे सामने आए तो बहुत पीटूंगा या पिटवाऊंगा। संक्षेप में मैं आपको अपने अनुभवों से एक पक्की राय देना चाहता हूं। अपने जीवन में अनचाहे हस्तक्षेप को किसी कीमत पर अनुमति न दें, भले आपके अपने भी कितना ही गिड़गिड़ाएं, अपने जीवन की कितनी ही दुहाई दें। क्योंकि बाद में सभी बदल जाते हैं, सब भूल जाते हैं कि आज अगर वो कुछ हैं तो किस कीमत और किसकी कीमत पर हैं। नहीं तो आप एक घटिया वेश्या बनकर रह जाएंगे, जिसे आपके घर वाले भी मान्यता देंगे। क्योंकि वेश्या तो केवल अपना शरीर बेचती है, पर आपको अपना शरीर, अपनी स्वतंत्रता, अपना धन, अपना समय सब कुछ खोना पड़ेगा। आपका अपना कुछ भी नहीं रहेगा। बहुतों को लगता होगा कि मैं हिंदी के पीछे क्यों पड़ा रहता हूं, जबकि मैं अधिकांश लोगों से बेहतर अंग्रेज़ी बोल सकता हूं। इसका कारण भी मेरे लिए इस विचारहीनता से निकलना ही था। कुछ हद तक मैं सफल हुआ हूं। हमारे परिवार की बजाए चाचाजी का परिवार अत्यंत हिम्मती रहा है। पूजा की अमरीका में हुई पहली शादी किसी कारण अधिक देर नहीं चल सकी। तो वह शादी तोड़ दी गई। अब पूजा ने दोबारा शादी कर ली है। मैं सोचता हूं, चाचाजी ने अपनी बेटी को भी जीवन भर झुलसने से बचा लिया और मेरे पिता ने बेटे को भी इस आग से निकलने नहीं दिया। हमारा परिवार चाचा जी के परिवार का पिछलग्गू ज़रूर है पर उनसे कुछ सीखता नहीं। हमारे परिवार की विचारशून्यता: मुझे अपने परिवार की विचारशून्यता के साथ बचपन से समस्या रही है। मेरे माता पिता कभी दूसरों के सामने अपने अधिकार या अपनी गरिमा की रक्षा नहीं कर पाते थे। वे दूसरों में जगह बनाने के लिए अपना नुक्सान करवा लेते थे। एक बार जब मैं छोटा था, हमारे पास एक लूना मोपेड हुआ करती थी। एक दिन पापा का कोई जानकार कहीं जाने के लिए मोपेड मांगने आया। मैंने उसे शायद पहले कभी नहीं देखा था। मोपेड में पेट्रोल कम था। पापा ने मुझे पैसे देकर मोपेड में पैट्रोल डलवाकर लाने को कहा। पेट्रोल पंप भी घर से कोई दो किलोमीटर था। मुझे बहुत हैरानी हुई कि पापा में उसे इतना भी कहने की हिम्मत नहीं कि मोपेड ले जाओ पर पेट्रोल डलवा लेना। जबकि चाचा जी का स्वभाव मेरे पिता जी से बिल्कुल उल्टा है। वे पेशे से डॉक्टर रहे हैं, मेरे भाई के लिए पेशे के लिए भी महत्वपूर्ण रहे हैं। उनका परिवार भी हमसे ज़्यादा दूर नहीं रहता था। हालांकि उनके बेटे मनु, जो मुझसे चार साल छोटा है, के साथ मैं बचपन से खेलता रहा हूं, पर वे लोग हमारे परिवार पर हमेशा से हावी रहे हैं। मेरे चाचा चाची घर आकर मुझे छोटे दिल वाला कहकर चले जाते, चाचाजी मनु के होते हुए मुझे सिगरेट लेने के लिए भेज देते। मुझे बुरा लगता, पर कुछ कह नहीं सकता था, क्योंकि मेरे मां बाप भी यह देखते रहते, पर कुछ कहते नहीं थे। बल्कि उनके कहने पर मुझे झिड़क देते थे। मैं इन स्थितियों में अगर कभी विरोध करता तो या तो पिता जी मुझे झिड़क देते, या मेरा भाई अजीब से तर्क देकर मुझे चुप करा देता। मेरा भाई और कंचन दीदी भी मेरे मां बाप की तरह ही थे। चाचा जी के परिवार के साथ हंसी ठिठोले करना ही उनका काम रहता। मेरे और स्वप्न दीदी के दिल पर क्या गुज़रती थी, उन्हें कभी ख्याल नहीं आता था। शायद बड़े परिवारों में ऐसा अक्सर होता हो। फिल्म पटियाला हाउस की कहानी कुछ कुछ मिलती है हमारी कहानी से। मैं दसवीं कक्षा में हुआ तो मेरे घर वालों ने अपनी क्षमता के अनुसार एक काम चलाऊ घड़ी मुझे लेकर दी। दूसरे ही दिन मेरे चाचा ने, जो अधिक संपन्न थे, मनु को एक महंगी घड़ी लेकर दी और हमारे ही घर आकर सबके सामने उसे कहने लगे कि ऐसी घड़ी तो किसी दसवीं के लड़के के पास भी नहीं होगी। और मेरे घर वालों ने चूं तक नहीं की। मैं कभी अकेले में माता पिता या भाई से शिकायत करता तो वे उल्टा मुझे ही समझाते रहते कि ऐसे मूंह फट लोग असल में दिल के सच्चे होते हैं। बड़े होकर इनके बच्चे ही इनका खून पीएंगे। पर आज सब कुछ उल्टा दिख रहा है। मेरे चाचा जी का परिवार अभी भी जुड़ा हुआ है और हमारा परिवार पूरी तरह छिन्न भिन्न हो गया है। केवल राख बची है उसकी। अपनी अपनी जगह सब ठीक हैं, संपन्न हैं, पर परिवार नाम की कोई चीज़ नहीं। हमारे परिवार में family values का अभाव रहा। बच्चों को छोटे छोटे संस्कार सिखाना, जैसे खुद में विश्वास रखना, हमेशा एक दूसरे का साथ देना, यह कभी भी नहीं सिखाया गया। यहां तक कि मेरी शादी के बाद भी मेरे माता पिता की यह प्रवृत्ति नहीं बदली। एक बार चाचा जी के परिवार की बातों में आकर मेरे पापा ने हम दोनों को झिड़क दिया कि हम चाचा के परिवार के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते। मै उन दिनों मुंबई में काम करता था। मुझे इससे बहुत धक्का लगा। वे मुझसे प्यार करते ही नहीं थे। मोनिका को भी वे कुछ कहने या झिड़कने का मौका देखते रहते। मेरा भाई जो खुद को बहुत तोप समझता है, भी उससे ऐसे बात करता था जैसे हम मोनिका को खरीद कर लाएं हों। बचपन में भी पापा मुझे चाची जी की बातों में आकर झिड़कते रहते कि मैं अपने चचेरे भाई को अपने खिलौने नहीं देता हूं। चाचा जी मुझसे बच्चों की तरह लड़ते रहते। एक बार मैंने मनु को कह दिया कि तुम्हारे पिता सिगरेट पीते रहते हैं। उसने उन्हें जाकर बता दिया और चाचा जी हुक्का पानी लेकर मेरे ऊपर चढ़ गए। मैं यह बात अपने माता पिता को नहीं बता सका, क्योंकि उन्होंने मेरा पक्ष लेना ही नहीं था। मैं चाचा जी से कोई भी favour के लिए पूछने से डरता था। मेरी ज़िंदगी के मुख्य गुनहगार हैं मेरे माता पिता, मेरा भाई और मेरी बड़ी बहन। उसके बाद मेरे चाचा जी का परिवार। इन्होंने अपने तर्कों, बर्ताव और बेरुखी से मुझे लगभग तबाह कर दिया है। मेरे माता पिता का तो भी कोई भी एहसान मेरे ऊपर नहीं रह गया है। बल्कि अब तो मैं अपने ख्यालों में उन्हें हज़ारों बार पीट चुका हूं। ऐसा लगता था जैसे मेरे घर वालों के पास बात करने के लिए मेरे चाचा के परिवार के अलावा कोई नहीं है। बाकी रिश्तेदार तो थोड़ा दूर रहते थे। वैसे भी मेरे चाचा का परिवार अधिक संपन्न, खुशहाल और अच्छा दिखने वाला था। पर चाचा के परिवार ने हमेशा केवल अपनी ही सोची। कभी पारिवारिक मसलों में कोई उत्तरदायित्व नहीं लिया। चाचा ने एक बार मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने हमेशा केवल ऐश करना सीखा है, भले अपने बल पर या किसी और के सर पर। 1997 में मेरी चचेरी बहन पूजा पढ़ने के लिए अमरीका गई तो उसका अधिकांश खर्च मेरे पिता जी ने उठाया। पर उन्होंने मेरे साथ कभी यह बात नहीं की। मुझे इसके बारे में बहुत बाद में पता चला। पूजा को परिवार के सब लोग बहुत मानते थे और उसे प्यार करते थे। वह उम्र में छोटी होने के बावजूद बहुत समझदार, चुस्त और सुंदर थी। वह अब भी अमरीका में रह रही है। मेरे भाई और बहन के बच्चे भी उसी का अनुकरण करते हैं। पर उसकी बेरुखी ने भी मेरा कई बार दिल दुखाया, खासकर उसे न समझने वाले मेरे घर वालों ने। 1998 में मैं मुंबई में नौकरी करता था। वह भारत, यानि पंजाब आई। मेरे माता पिता भी परवाणु में उससे मिलने गए। पर उसने मुझे फोन नहीं किया। मैंने जब परवाणु फोन किया तो सब लोग dinner करने बाहर गए हुए थे। घर में काम करने वाली एक लड़की ने फोन उठाया। मुझे उम्मीद थी कि वे लोग वापस आने पर फोन करेंगे। आखिर पापा मम्मी भी साथ थे। पर नहीं, कोई फोन नहीं आया। आखिर जब वह बाद में बरनाला मेरे माता पिता के पास आई तब मेरे पापा ने फोन करके उससे बात करवाई। मुझे यह बहुत बुरा लगा कि मेरे पापा की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे परवाणु में ही उसे मुझे फोन करने के लिए कहते, बाद में बरनाला अपने घर वापस आकर खुद फोन करके बात करवा रहे हैं। जबकि वह उनके खर्च पर अमरीका गई थी। इसके उल्ट जब बाद में मोनिका अमरीका (california) चली गई तो मेरे चाची जी ने हमारे घर में हल्ला मचा दिया कि उसने वहां जाकर मनु और पूजा से बात करने की ज़रूरत नहीं समझी। और मेरे माता पिता और भाई बहन सब सुनते रहे। मेरे ताया जी, यानि पिता जी के बड़े भाई, पेशे से पत्रकार रहे हैं, पर बहुत जल्द ही ताई जी मृत्यु के कारण कम से कम मेरे होश संभालने से लेकर तो वे अकेले ही रहते आए हैं। उम्रदराज़ होने के कारण दो बार गिरने से उनकी चूल्हे की हड्डियां टूट गईं और उनका ऑप्रेशन करवाना, उन्हें घर पर रखना, उनकी टट्टी साफ करना, उन्हें खिलाना पिलाना सब काम हमारे परिवार के ऊपर आ पड़ा। मेरे चाचा के परिवार ने बिल्कुल साथ रहते हुए भी कभी कुछ नहीं किया। और मेरे परिवार ने यह मुद्दा कभी नहीं उठाया। उन्हें बस यह डर था कि वे लोग बोलना न छोड़ दें। एक तरह की हीन भावना हमारे परिवार में हमेशा रही है। मेरे माता पिता दोनों दसवीं पास हैं और चाचा डॉक्टर। पर मेरे माता पिता ने सारी उम्र बिजली घर में सरकारी नौकरी की है। इसलिए दोनों की अंग्रेज़ी, खासकर मेरे पिता जी की बहुत अच्छी रही है। वे हमेशा अंग्रेज़ी अखबार पढ़ते आए हैं, अंग्रेज़ी में पत्र व्यवहार करते आए हैं। मेरे लिए तो किसी वृद्ध आदमी में इतनी काबलियत होना बड़ी बात थी। पर उनके दिमाग से यह कभी नहीं निकला कि वे केवल दसवीं पास हैं। इसलिए वे कभी छाती ठोककर कभी किसी से बात नहीं कर पाए। इन सभी बातों का मेरे मस्तिषक पर असर पड़ा है, हीन भावना के रूप में। मेरे परिवार के लोग दिल के सच्चे होते हुए भी आखिरकार स्वार्थी और बेवकूफ़ साबित हुए। और मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों पर इन बातों का कोई असर हो। इसलिए बच्चों को इन लोगों से दूर रखना ज़रूरी है। और मुझे ज़िंदगी की जंग जीतनी है, हर हाल में, किसी भी तरह।