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Basera Magazine needs people for page payout and graphics design
Basera Magazine invites indians living in Germany to write articles in other Indian languages for its online version. Article should be original, and preferably in electronic form.
2010-02-06 15:00:49 post a coment
Imprint
Introduction
Basera, Germany's first Hindi print magazine being published in Munich since January 2008 is a unique effort to bring the two cultures closer. This is available in internet (www.basera.de) as well as in high quality, glossy, color, A4 size, 28 pages print magazine, printed quarterly with offset technology in Germany. This magazine attempts to report about intercultural and lifestyle themes from Germany.
Media Daten:
Auflage: 500 Exemplaren
Format: A4, 28 Seiten, 4-farbig Glanz
Zielgruppe: In Deutschland lebende Inder
Titel Bedeutung (Basera): Die Wahlheimat
Verteilung: Verkauft durch indische und internationale Geschäfte im Deutschland (siehe Verkaufsstellen)
Themen: Intercultural, lifestyle
Sprache: Hindi
Erscheinung: drei-monatlich (siehe Details)
internet: www.basera.de
Printed in Germany
USt-IdNr.: 145/192/20203
Anzeigepreise
€75 für ein Viertel Seite (105mm x 148,5mm, 1241 x 1754 pixels)
€150 für halbe Seite (210mm x 148,5mm, 2480 x 1754 pixels)
€300 für ganze Seite (210mm x 297mm, 3508 x 1754 pixels)
€26 für 65 x 40 mm, (768 x 473 pixels)
Alle Preise sind 19% mwSt inklusive
Die Daten sollen im JPG oder PDF Format, im CMYK 4-farbig mit 300dpi auflösung sein
subscription details
Herausgeber, Verantwortlichen für die Redaktion:
Rajneesh Mangla
Albert-Roßhaupter-Straße 110
81369 - München
landline: +49-89-1394-1911
mobile: +49-179-764-4347
email: rajneesh.mangla@gmail.com
Redaktion und Gestaltung
Ramashankar Sharma: sharmarama2000@yahoo.com
Redaktionelle Mitarbeiter
Sarabjit Singh Sidhu: sidhu_66@hotmail.com
Christine Liedl: tine-in-nepal@hotmail.de
Jasminder Nagpal-Metzger: ina.metzger@web.de
Slogan
Basera - Deutschlands einzige Hindi Magazin
Press
Sendlinger Anzeiger (http://www.sendlingeranzeiger.de/) 23.01.08

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2010-02-06 14:52:31 post a coment
बसेरा पत्रिका के विक्रय केन्द्र (Verkaufsstellen)
Only selected shops are listed here.
80335 München, International Presse, Hauptbahnhof
बायरिश पुस्तकालय, म्युनिक में बसेरा पत्रिका उपलब्ध
जर्मन राष्ट्रीय पुस्तकालय में बसेरा पत्रिका उपलब्धः
बसेरा पत्रिका ऑनलाईन खरीद के लिए उपलब्ध
2010-02-06 13:10:01 post a coment
आक्सी और समयोग ने बनायी नयी संस्था
Aksi, the one and half years old registered organisation of indologie students ans Samyoga, an informal organisation of indian students in Munich finally merged to form a new organisation. Legally speaking, Aksi is renamed to a more generic name.
कई सप्ताहों के विचार विमर्श के बाद अन्त में इण्डोलोजी के छात्रों की संस्था आक्सी और भारतीय छात्रों की संस्था 'समयोग' ने मिलकर एक नयी संस्था का गठन किया जिसका नाम है 'Gesellschaft für deutsche-indische Zusammenarbeit e.V.', यानि 'जर्मन-भारतीय सहयोग के लिये सोसायटी'। कानूनी भाषा में आक्सी, जो पहले से एक पंजीकृत संस्था है, ने अन्य भारतीय लोगों और संस्थाओं को साथ मिलाने और आने वाले इवेन्ट्स के आयोजनों के लिये बेहतर रूप से प्रायोजक ढूंढने के लिये अपना नाम बदल कर एक अधिक सामान्य और जर्मनों द्वारा आसानी से समझा जा सकने वाला नाम अपना लिया है। इस बदलाव के मुख्य अंश हैं संस्था के नाम में बदलाव, अध्यक्ष बोर्ड के सदस्यों की गिनती तीन से बढ़ाकर सात करना, और अध्यक्ष बोर्ड के सदस्यों का फिर से वोट द्वारा चुनाव। यह अन्तिम बैठक और चुनाव 23 जनवरी को भारतीय कोंसलावास के कॉन्फ़्रेंस रूम में आयोजित किये गये जिसमें हिस्सा लेने के लिये आक्सी के वर्तमान लगभग चालीस सदस्यों के अलावा बहुत सारे अन्य लोगों को ईमेल आदि द्वारा न्यौता दिया गया था। पर आक्सी के वर्तमान सदस्यों में से केवल कुछ ही चुनाव में हिस्सा लेने के लिये आये। बैठक में सबसे पहले सिद्धार्थ मुदग्ल, जो दोनों संस्थाओं के बीच समन्वयक का काम करते रहे हैं और इवेन्ट मैनेजमैंट में सबसे सक्रिय रहे हैं, ने नयी संस्था के उद्देश्यों, संरचना और उसके द्वारा आयोजित करवाये जाने वाले कुछ संभावित इवेन्टस पर नज़र डाली। फिर उन्होंने वहां उपस्थित लोगों को नयी संस्था का सदस्य बनकर ब्रेक के बाद होने वाले अध्यक्ष बोर्ड के चुनाव में हिस्सा लेने के लिये प्रोत्साहित किया। सदस्य बनने के लिये वार्षिक सदस्यता शुल्क व्यवसायी लोगों के लिये बीस यूरो और छात्रों के लिये दस यूरो निर्धारित किया गया। उसके बाद ब्रेक हुआ जिसमें लोग आपस में विचार विमर्श कर सकते थे। ब्रेक के बाद अध्यक्ष बोर्ड के लिये चुनाव हुये। क्योंकि चुनाव में केवल संस्था के सदस्य ही भाग ले सकते थे, इसलिये वहां उपस्थित कुछ नये लोग भी फ़ार्म भर के और सदस्यता शुल्क अदा कर के सदस्य बन गये और फिर चुनाव में हिस्सा लिया। अध्यक्ष मण्डल के सदस्य इस प्रकार चुने गये हैं- डा॰ अरुण मंकन, डा॰ गोर्डन किचोन, पदमाबती मोण्डल, रिचर्ड होल्ज़बर्गर, शैलेष मोरे, सिद्धरा्थ मुदगल, डा॰ एस रायचौधरी। इसके अलावा एक अनौपचारिक सलाहकार मण्डल भी वोट द्वारा चुना गया है जिसके सदस्य हैं भारतीय महाकोंसल श्री अनूप कुमार मुदगल, म्युनिक विश्वविद्यालय के इण्डोलोजी विभाग के अध्यक्ष प्रो॰ हार्टमान, बायरन सरकार के एकता आयुक्त एम नॉयमायर, श्री निलादरी मुखर्जी और पत्रकार रुथ बुर्चार्ड। कोंसलावास भी इस संस्था को बैठकों के लिये अपना कॉन्फ़्रेंस रूम उपलब्ध करवा कर नैतिक समर्थन दे रहा है।
2010-02-06 08:50:52 post a coment
समय, एक मुद्रा के रूप में
कितना अच्छा हो अगर आप के पास पड़ी फाल्तू चीज़ों या आपके फाल्तू समय में कुछ मदद के बदले में आप को अपनी ज़रूरत की कोई वस्तु या सेवा मिल जाये। जैसे आप अपने अतिरिक्त समय में किसी का कंप्यूटर ठीक कर दें और बदले में वह आपके घर की मरम्मत कर दे या कुछ घंटों के लिये आपके बच्चे की देखभाल कर ले। व्यक्तिगत तौर पर आप अपने मित्रों के साथ ऐसा करते भी होंगे। पर कितना अच्छा हो अगर ऐसा कुछ संगठित और व्यवस्थित तौर पर भी हो सके, उन लोगों के साथ जिन्हें आप जानते न हों। भाग्यवश जर्मनी में ऐसी अनेक संस्थायें हैं जो अर्थ व्यवस्था के इस पहलू पर काम करती हैं। इनमें पैसों की मुद्रा नहीं चलती बल्कि समय की मुद्रा चलती है। ये संस्थायें माह में एक या दो बार किसी जगह पर बैठक आयोजित करती हैं जिसमें सदस्य आकर एक गोल घेरे में बैठ जाते हैं। वे अपने साथ एक सूची लेकर आते हैं, जिस पर लिखा होता है कि उनके पास देने के लिये क्या क्या वस्तुयें या सेवायें हैं, और उन्हें किन किन वस्तुओं या सेवाओं की ज़रूरत है। फिर वे एक एक करके अपना परिचय देते हैं और एक दूसरे के साथ आदान प्रदान करते हैं। ये संस्थायें समय समय पर एक पत्रिका भी प्रकाशित करती हैं, जिनमें सदस्य अपने प्रस्ताव और ज़रूरतें लिखित रूप से दर्ज करवा सकते हैं। सदस्य बनने के लिये आपको कम से कम एक बार नियमित तौर पर आयोजित होने वाली एक अन्य बैठक में भाग लेना होता है जिसमें संस्था और इसके नियमों के बारे में बताया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है कि आप इसे धंधे के तौर पर न लें, केवल अपने फाल्तू समय और वस्तुओं का प्रयोग करें। अन्यथा आयकर विभाग आपके और संस्था के लिये समस्या भी पैदा कर सकता है। विश्व में ऐसी हज़ारों, जर्मनी में लगभग तीन चार सौ और म्युनिक और उसके आस पास के क्षेत्र में ऐसी करीब चालीस बैठकें आयोजित होती हैं। इनमें से कई बैठकें एक ही संस्था द्वारा आयोजित की जाती हैं। आमतौर पर ये बैठकें केवल उसी क्षेत्र पर केन्द्रित होती हैं ताकि आस पास के लोग एक दूसरे की मदद कर सकें। पर सदस्य दूसरों क्षेत्रों की बैठकों में भी भाग ले सकते हैं। इनमें हर तरह की चीज़ें और सेवायें देखने को मिलती हैं, जैसे घर में रंग रोगन करना, संगीत बजाना सिखाना, भाषा या गणित सिखाना, विभिन्न प्रकार का खाना या पकवान बनाना, कंप्यूटर आदि सिखाना या ठीक करना, ज़रूरत पड़ने पर अपनी गाड़ी देना आदि। सदस्य बनने पर एक पुस्तिका दी जाती है जिसमें आप अन्य सदस्यों के साथ आदान प्रदान का लेखा जोखा रखते हैं। अक्सर इनमें मुद्रा का नाम 'प्रतिभा' रखा जाता है जिसकी तुल्ना समय के साथ की जाती है, जैसे पांच प्रतिभायें प्रति घंटा। यानि अगर आप चार घंटे के लिये किसी की मदद करते हैं तो दोनों सदस्य अपनी पुस्तिका में बीस प्रतिभाओं का आदान प्रदान दर्ज करते हैं। एक सदस्य से ली या दी गई प्रतिभाओं की आपूर्ति किसी अन्य सदस्य के द्वारा भी की जा सकती है, यानि यह ठीक एक मुद्रा की तरह काम करती है। इसमें समय समय होता है, उसकी कीमत बराबर रहती है, भले आप चार घंटों के लिये दूध दोह रहे हों या हीरों की देखभाल कर रहे हों। संस्था के लिये मासिक सदस्यता शुल्क भी इन्हीं प्रतिभाओं द्वारा दिया जाता है, जैसे बीस प्रतिभायें प्रति माह। इस शुल्क से संस्था का कागज़ पत्री, इंटरनेट, कार्यालय आदि का खर्च निकलता है। हालांकि आरम्भिक दौर में सदस्यों के पास देने के लिये कम और लेने के अधिक होता है। इसलिये वे एक हद तक माइनस में भी जा सकते हैं। जैसे माइनस दो सौ। ऐसे ही अधिकतम प्रतिभायें एकत्रित करने की भी एक सीमा निर्धारित होती है, जैसे प्लस पांच सौ। मुख्य मुद्दा है कि सदस्य केवल एक तरफ़ा काम न करें, वे नियमित तौर पर दें भी और लें भी वर्ना यह कान्सेप्ट काम करना बन्द कर देता है। अनुभवी सदस्य होने पर सीमायें बढ़ा दी जाती हैं जैसे प्लस दो हज़ार और माइनस एक हज़ार। पर बिना सीमाओं के काम नहीं चलता। साल दर साल ये संस्थायें एक परिवार की तरह विकसित होती जाती हैं जिनमें लोग आपस में एक दूसरे की मदद करते हैं, मिलकर त्यौहार मनाते हैं, खाना बनाते हैं, गाने गाते हैं, बाज़ार आयोजित करते हैं आदि आदि। विभिन्न शहरों की बहुत सी संस्थायें भी आपस में भी काम करती हैं। जैसे म्युनिक की एक संस्था का सदस्य अगर किसी काम से हैम्बर्ग जाता है तो रात रुकने के लिये उसे वहां की संस्था के किसी सदस्य के घर पर जगह मिल जाती है। इस स्थिति में सोने का समय नहीं बल्कि केवल नहाने धोने का और नाश्ते आदि का समय गिना जाता है। यानि केवल वह समय गिना जाता है जिसमें आप वाकई हिल डुल रहे हों। म्युनिक के अन्दर के क्षेत्र में फिलहाल दो ऐसेी संस्थायें हैं जिनके वेब पते निम्न प्रकार हैं।
http://lets-muenchen.de/
http://tauschringmuenchen.de/
इनमें से पहली संस्था 1993 से चल रही है। दूसरी संस्था भी पहली संस्था से कुछ वर्ष पहले अलग होकर बनी है। पहली संस्था में किसी समय पर ग्यारह बारह सौ सदस्य रहे हैं पर आज कल कोई छह सौ सदस्य हैं। म्युनिक के अलग अलग क्षेत्रों में यह संस्था सात बैठकें आयोजित करती है। कोई भी सदस्य किसी क्षेत्र में अलग बैठक भी शुरू कर सकता है। पर अक्सर अगर किसी बैठक में पांच से कम लोग नियमित तौर पर आयें तो वह बन्द कर दी जाती है। सदस्यों की औसत आयु चालीस से ऊपर हैं। यानि इसमें अधिकतर लोग वृद्ध हैं क्योंकि युवाओं को ऐसे कॉन्सेप्ट में रुचि नहीं होती, और न ही ज़रूरत। ये संस्थायें अक्सर पंजीकृत नहीं होतीं लेकिन फिर भी सुव्यवस्थित तरीके से चलती हैं।
कहते हैं ऐसी सबसे बड़ी संस्था अर्जेंटीना में है। वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो जाने के बाद वहां के लोगों ने ऐसी संस्थायें बनाने के बाद इसे पुनः खड़ा किया था। आज के समय में वहां करीब सवा लाख लोग सदस्य हैं।
2010-02-04 06:56:02 post a coment
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